ज्ञान और विज्ञान में ,
जीत और हार में,
कला और काबीलियत में,
सब में , सब से … पीछे खुद को पाता हूं।
रोता है मन मेरा भी,
की थोड़ा और उछल कर उस डाली को छू लूं
कद में ख़ुद को कम पाता हूं
कोशिश हज़ार करूं
हर बार किसी न किसी से पीछे रह जाता हूं
कुछ लोग समझाते हैं कि
क्यूं मैं तुलना करता हूं ख़ुद की सब से,
कुछ देर, मैं अपने मन को समझाता हूं
फिर भी वहीं ख़ुद को पाता हूं।
अहंकार से भरा देख मुझे
ज्ञान का दीपक छुप जाता है।
ना दिल से, न दिमाग़ से
नहीं मैं एक पल ठहर पाता हूं
विचलित मन ख़ुद को सबसे कम आंके हैं
विकल्प सारे तहस – नहस कर
मन ही मन में गुर्राता हूं
चू भर भी आवाज़ नहीं है
सृष्टि इसकी खाक हुई है
ख़ुद को ख़ुद से बेगैरत कर
मैं गैरों से मिलता हूं
हाल चाल सब, रूप –ढाल सब
मैं न किसी का हमदर्द बन पाता हूं,
सबको खुश रखने की जिद्द में
खुद को जंजीरों में पाता हूं
ख़ुद को तार तार कर लूं
दिल को जार –जार कर दूं
या मैं दस हज़ार कर लूं
कितने आस मैं ये तोडू
कैसे तुझको अब मैं जोडू
कोशिश और लाख कर लूं
ये सांसे रोक लूं अब और जिंदगी गुलज़ार कर लूं


क्यों उस नूर को पाना चाहता था
जो तुझसे यूँ बेगैरत था
उसे पाने के लिए
तूने दौड़ना सिखा
चलना सिखा,
लड़ना सीखा ,
हर ऊंचियों को छूना सीखा
शायद दौड़ते – दौड़ते तू भूल गया है की
कभी कोई नूर भी हुआ करता था
