एक खून उबाल भर रहा है
आहिस्ता आहिस्ता ।
एक जुनून लहू में भर रहा है
आहिस्ता आहिस्ता ।
सच बोलना सबसे आसान होता है
पर पूंजीपतियों की इस बनावटी दुनियां में, यह एक अपराध होता है ।
इसे जलन, द्वेष, अंधविश्वास से सींचकर
अपनी ऐंठ चलाना ये इनका एकमात्र व्यवसाय है ।
पाठशाला की किताबों से
शहर के अखबारों तक
हर तरीके से मज़हब का
ज़हर परोसा जा रहा है ।
जो नहीं अपनाना चाहते
उनपर थोपा जा रहा है ।
नफ़रत इतनी उबाल भर गई है . . .
हर दुसरे तानाशाह द्वारा इसे सींचा जा रहा है
90 के दशकों की फिल्मों में
अपराधों के जो अपवाद दिखाए थे
उन्हें इस सदी की बुनियादी ढांचे में
पिरोया जा रहा है ।
कहते है लोकशाही में राजा
प्रजा के चरित्र का उदाहरण होता है
जैसे जनता की सोच , वैसा राजा
हिटलर खुद गद्दी पर नही बैठा था
वो इसी प्रजा की विचारधारा के बल पर
जर्मनी में नफ़रत का बीज बो रहा था , जैसा अब हो रहा है।
जो किताबें जलाने में नहीं हिचकता
वो इंसान को भी जलाने में नहीं हिचकता
जब पुस्तकालय में भी सावरकर और हिटलर को वीर बताने वाली किताबें बढ़ जाए
और
अहिंसा और विज्ञान एक परे कर दिया जाए
समझ लिजिए राजा विध्वंश की तैयारी कर रहा है
विनाश काले विपरूत बुद्धि वाली प्रजा के लिए यह एक रोमांचक सर्कस है,
उसे मज़ा बहुत आता है
तभी तक,
जब तक की उसका मकान , उसका परिवार या उसका अहंकार
मौत के कुवें के खेल का पात्र नहीं बनता ।
फिर कहानी कुछ और होती है, तमाशा खुद के साथ होता है
और तमाशबीन में शामिल लोगो को देख कर दया भी आती है और हंसी भी,
की कल इनकी भी बारी आयेगी ।
कभी तो ये समां बदलेगा, इस उम्मीद में ……
एक खून उबाल भर रहा है
आहिस्ता आहिस्ता ।
एक जुनून सा
इश्क़ दिल में उतर रहा है
आहिस्ता आहिस्ता . . . .
