चंचलता, बेबाकपन, बेफ़िक्री-सी
उसकी अदा है।
ज़ुबान उसकी बड़–बड़ करते नहीं थकती,
पर आवाज़ सुकून से भर देती है।
ये वही पल है, जिसकी तुझे हमेशा तलाश रहती थी ,
शायद अब भी है…
ये कोई चाहत नहीं है,
ये बस एक सुकून भरा लगाव है।
ज़िंदादिल लोगों को देखकर ऐसा सुकून मिलता है,
जैसे एक ज़िंदगी की ख़्वाहिश पूरी हो गई हो
ग़ज़ब का एहसास…
सरल-सा प्यार — कोई इश्क़, मोहब्बत, दीवानगी नहीं,
बस एक ठहराव-सा एहसास,
जिसमें सिर्फ़ ख़ुशी है, शब्द नहीं।
कई हैं यहाँ, पर सब वो नहीं हैं,
उसमें एक क्रांति की आग है।
वो मान्यताओं और विज्ञान का घालमेल नहीं करती,
वो विज्ञान के तथ्यों को रखती और परखती है।
वो Creationism vs Darwinism पर बहस करती है,
उसकी आँखों में विज्ञान की समझ है।
तजुर्बा भले ही कम हो,
पर उसकी बातें दिल–दिमाग़ दोनों का संतुलन हैं।
सोचता हूँ कि यह बेबाकपन
यूँ ही हमेशा अहंकार से कोसों दूर रहे।
छणभर ही काफ़ी होता है
आत्मविश्वास को अकड़ में बदलने को।
जन्हु की बेटी-सी,
एक सुंदर बहती नदी –
जिसमें ठहराव ऐसा जो मन को शिथिल कर दे,
और वेग ऐसा जो पत्थर को भी क्षय कर दे।
तुम अपनी मासूमियत ज़िंदा रखना,
लोगों को प्रेरित करते रहना,
क्रांति की लौ बुझने न देना
तुम प्रवाह सी बहती रहना ।

