The scientific temper is a rational approach to the discovery of truth through free and creative thinking with humility, not arrogance. In highlighting the essence of Scientific temper, B.K. Pattnaik quotes A. R. Desai Indian people had done pioneering work in sciences such as mathematics, chemistry, metallurgy, and medicine, centuries before most of the modern… Continue reading In Gratitude to Humble Rational Minds
Author: avinamaurya
नदी
चंचलता, बेबाकपन, बेफ़िक्री-सीउसकी अदा है।ज़ुबान उसकी बड़–बड़ करते नहीं थकती,पर आवाज़ सुकून से भर देती है।ये वही पल है, जिसकी तुझे हमेशा तलाश रहती थी ,शायद अब भी है...ये कोई चाहत नहीं है,ये बस एक सुकून भरा लगाव है।ज़िंदादिल लोगों को देखकर ऐसा सुकून मिलता है,जैसे एक ज़िंदगी की ख़्वाहिश पूरी हो गई हो ग़ज़ब… Continue reading नदी
सत्य से परे, घुटती सद्भावना
कहते हैं भिड़ की कोई आवाज़ नहीं होतीकहते हैं ऊपरवाले की लाठी में भी आवाज़ नहीं होती , ये कैसी विडंबना है सच को दबा कर झूठ की पूजा हो रही है ,और हम पर दबाव बनाया जा रहा है कि तुम भी पूजो झूठ को ,वरना रहने लायक नहीं बचोगे | ये भय का… Continue reading सत्य से परे, घुटती सद्भावना
Doomsday Clock
एक खून उबाल भर रहा हैआहिस्ता आहिस्ता । एक जुनून लहू में भर रहा हैआहिस्ता आहिस्ता । सच बोलना सबसे आसान होता हैपर पूंजीपतियों की इस बनावटी दुनियां में, यह एक अपराध होता है ।इसे जलन, द्वेष, अंधविश्वास से सींचकर अपनी ऐंठ चलाना ये इनका एकमात्र व्यवसाय है । पाठशाला की किताबों से शहर के… Continue reading Doomsday Clock
आत्मविश्वास से विहीन
ज्ञान और विज्ञान में ,जीत और हार में, कला और काबीलियत में,सब में , सब से ... पीछे खुद को पाता हूं। रोता है मन मेरा भी, की थोड़ा और उछल कर उस डाली को छू लूं कद में ख़ुद को कम पाता हूं कोशिश हज़ार करूं हर बार किसी न किसी से पीछे रह जाता हूं कुछ लोग समझाते… Continue reading आत्मविश्वास से विहीन
कभी समय के साथ ना चल पाया
कच्ची उम्र में मोहब्बत कर बैठा अब दिल लगाने की उम्र निकल गईसमय के साथ ना चलना आया इसे... किताबों के बोझ से घुट–घुट गुज़ारे वो बचपनअब शब्द रास आए तो सीखने की उम्र निकल गईसमय के साथ ना अब भी चलना आया इसे... जब दिल लगा तो साहस न थाअब संगी–साथी ढूंढने की उम्र निकल… Continue reading कभी समय के साथ ना चल पाया
बेवजह परवाह
मौसम धुंआ धुंआ सा थाहवा में कुछ ज्यादा ही नमीं थीपिछली बार बस झलक ही देखी थीतब से एक छवि थीदिल के किसी कोने में इस बार सामने ही आ गएमन में एक तूफ़ान सा उठा और गहरा सन्नाटा छा गया कशिश थी या सपनों में से निकली कोई छविना प्यार आया, ना इश्कबरसो से… Continue reading बेवजह परवाह
घाटी – पहाड़ी के रंगरेज़
ऐ रंगरेज़ क्या घोला रंग तुमने इसमेंरंग से बेरंग हो गया तू तेरे सपनों के शहर मेंविष्व के सैलानी भूले भटकेतेरे आँगन आके सुकून पाते थे क्यूँ तू इनकी बातों में आकरअपनी विविधता की ताकत को कमज़ोरी बना बैठा | हिमशृंगों की हवाहिमालय की चोटीउसकी धुप सेउसकी हवा सेये हराभरा शहररौशन था तारे सितारों की… Continue reading घाटी – पहाड़ी के रंगरेज़
रंग-बिरंगा अहसास
जाने कितनी आँखें ख़ुशी से भरी थीजाने कितनी बातें लबों पे आकर रह गई थीएक ऊर्जा शरीर में सैलाब सी होकर भी शांत थीएक पल उसके आने की आहट में रुका हुआ था एक छवि तो रोज़ आँखों में देखता हूँ उसकीआज हकीकत में देख रहा था,सब शून्य सा होकर वक्त को समेट लिया था… Continue reading रंग-बिरंगा अहसास
मैं कौन हूं
मैं एक चलचित्र का खोया हुआ सा किरदार हूंमैं उस किरदार को एक दिन परदे पर देखता हूंऔर फिर कुछ सौ दिनों तकउस किरदार के सांचे से बाहर नहीं आता मैं Jordan का टूटा हुआ दिल हुं मैं Veera की पक्की चाहत और कच्ची कोशिश हुं मैं Shiuli और Dan के बीच हुई अनकही बात हुंमैं Ved… Continue reading मैं कौन हूं
