Equality in Destruction

“An eye for an eye makes the whole world blind.”

Perhaps humanity is better off blind. We do not deserve to witness the beauty of a world that we have spent centuries destroying—its forests, its oceans, its countless species, and, ultimately, ourselves.

मेरी गुज़ारिश है उन सभी फ़िलिस्तीनियों से कि आप शस्त्र उठा लें।

न Trump मर रहा है, न Netanyahu जैसे हत्यारे।
इन्हें और इनके नुमाइंदों को उस मरे हुए ईश्वर का वरदान है।

ये चरित्र, व्यवहार और नैतिकता के पाठ
सिर्फ़ ग़रीबों के लिए बने हैं।

मैं पूछता हूँ, कब तक जियोगे ऐसे?
आख़िर कब तक देखोगे यूँ ही
अपनी और अपनों की ज़िंदगी को
नीस्त-ओ-नाबूद होते हुए?

हम मानवता के उस नपुंसक इतिहास में जी रहे हैं,
जहाँ लगभग सभी जन-देश स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं,
पर किसी में ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत नहीं।
किसी में इतना बल नहीं कि वह दुराचारी को दुराचारी कह सके।

क्यों?

क्योंकि मानव ने
साहस को गिरवी रखकर जंजीरें खरीदी हैं।
हम सभी ग़ुलामी मानसिकता के कैदी हैं।
हम जीवन जीने के लिए अपनी संवेदनशीलता को मार चुके हैं
तुम मत बनो हमारे जैसे असंवेदनशील

Two men manipulating puppet controls over workers and war destruction

बन जाओ भगत सिंह,
हर उस संसद में बम लगवाओ जहाँ ,
बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है


पर जान लो यह कि
ये साधारण बहरें नहीं है ।
ये तुम्हारी बात सुनकर भी अंजान बनेंगे ।
इस बात का ध्यान रखना की,
धमाका सिर्फ आवाज़ तक सीमित न रहे।
चोट और खून के धब्बे उन सबके दर तक दस्तक दे,
जहाँ इन दरिंदो की जय जयकार होती है

ये सूट-बूट में, सफ़ेद चमकती-सी इमारतों में रहने वाले दरिंदे,
इनकी चोट पर रहम न करना ।
क्योंकि जब समय इनका था,
इन्होंने पूरी मेहनत और लगन से कोशिश की थी,
कि आपकी लाचारी में ये आपको तिनके-तिनके कर दें,
और उन्हीं तिनकों से ये अपनी शाख़ चमका सकें।

कोई ‘मारो या मरो’ वाली हालत नहीं थे इनके,
पर इन्होने तुम्हे रौंदने का एक मौका नहीं छोड़ा अपने फ़र्श को चमकाने में ।
और तुम्हारा तो अस्तित्व ही पूरी तरह से ‘मारो या मरो’ पर टिका है ।

ऐसे में शस्त्र उठाकर आप सिर्फ आत्मरक्षा करके अपना जीवन काट सकते हो ।
पर क्या वो जीवन भविष्य खुशहाल कर सकता है ?
अगर नहीं तो छोड़ो ये आत्मरक्षा
– अबकी शस्त्र सिर्फ दुष्कर्मियों और दुराचारी का हनन करने उठाना ।

जब राजा, व्यापारी और बैंक,
रोज़ आपके विध्वंस की चादर में,
अपने मुनाफ़े गिनने से नहीं कतराते,
तो फिर आप क्यों संकोच कर रहे हैं?

और अगर जब विध्वंश होना ही है ,
तो क्यों न लड़ते हुए इस जंग में मरे,
और फिर
विध्वंश सिर्फ एक तरफा हो जरुरी तो नहीं !

विनाश की राख हर जगह बराबर लगे ,
इसमें ही मानवता का भला है ।

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